मीडिया के वर्तमान परिस्थिति को बतलाती पुस्तक
'मीडिया का वर्तमान' यह पुस्तक अकबर रिज़वी द्वारा संपादित है। यह पुस्तक 'सबलोग' पत्रिका पर आधारित है, उस पत्रिका के पाठक चाहते थे कि पत्रिका में प्रकाशित महत्वपूर्ण सामग्री को एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया जाएं। इसी को ध्यान में रखते विश्व पुस्तक मेला- 2015, नई दिल्ली से 10 युवा संपादकों को जोड़कर और उनके द्वारा लिखे लेख को शामिलकर इस पुस्तक को तैयार किया गया है। यह पुस्तक 2015 में मीडिया की भूमिका को स्पष्ट करेगा। इस पुस्तक में 14 लेख को शामिल कर लेखकों ने अपने- अपने दृष्टिकोण उस समय के मीडिया के बारे में दिया है। यह लेख निम्न प्रकार के है :-समय से संवाद,भूमंडलीकरण, पूँजी और मीडिया,आजादी के बाद पत्रकारिता, क्या यही हिंदी पत्रकारिता का 'स्वर्णयुग' है ?, समकालीन हिंदी मीडिया की चुनौतियाँ, लोकतंत्र में मीडिया के खतरे, भारत में मीडिया स्वामित्व: हालात और चुनौतियाँ, लोकतंत्रीकरण की चुनौती, पब्लिक रिलेशन और मीडिया: कल, आज और कल, सूचना का अंत और मनोरंजन का आगमन, मीडिया: प्रतिनिधित्व का प्रश्न और अभव्यक्ति पर अंकुश, वास्तविक खतरे के आभासी औजार, भूमंडलीकरण और सम्प्रेषण का संकट ।
'आजादी के बाद पत्रकारिता: एक पर्यवेक्षण' यह लेख रामशरण जोशी द्वारा लिखी गयी है। वह इसमें 'अपराध बोध' की बात करते है जो उस समय में आपातकाल और राजनीति के लिए भी जरूरी था, पत्रकारिता के 'रोल मॉडल' के रूप नवभारत टाइम्स और दैनिक हिंदुस्तान जैसे समाचार पत्र को रॉल मॉडल के रूप में देखते है, पत्रकारिता के प्रमुख कालखंड, पत्रकारिता के नये तेवर, माथुर जोशी के दौर जैसे चीजों पर बात की है । 'भारत में मीडिया स्वामित्व: हालात और चुनौतिया 'लेख दिलीप खान ने लिखी है। वह मीडिया की को खरीद- फरोख्त का धंदा मानते, रिलायंस का मीडिया, जागरण: कितने धंधे और, दूसरे धंधों को चमकाने का हुनर: संदर्भ दैनिक जागरण आदि जैसे मुद्दों पर बात की गई है इस लेख में। 'लोकतंत्रीकरण की चुनौती' लेख पंकज बिष्ट द्वारा लिखी गयी जिसमे लोकतंत्र को बचाने में मीडिया की भूमिका पर प्रकाश डाला गया है। 'पब्लिक रिलेशन और मीडिया: कल, आज और कल ' यह लेख दिलीप मंडल द्वारा लिखा गया है। इसमें पब्लिक रिलेशन और मीडिया के भूत काल, वर्तमान और भविष्य काल के संबंध को विस्तार से समझाया गया है। 'सूचना का अंत और मनोरंजन का आगमन' लेख सुभाष धुलिया द्वारा लिखे लेख में मीडिया का निगमीकरण, राजनीतिक, सामाजिक और संस्कृतिक जीवन का मनोरंजिकरण, लोकतांत्रिक विमर्श बनाम नियंत्रण , समाचारीय घटनाओं के बदलते मानदंड आदि जैसे मुद्दे पर विस्तार से बात की गई है। 'वास्तिविक खतरे के आभासी औजार' लेख अभिषेक त्रिपाठी द्वारा लिखी गयी है। इसमें सोशल मीडिया की पृष्ठभूमि, अभिव्यक्तिबोर लोकतांत्रिकता का आभास, व्यहवाहरिक निष्कर्ष आदि जैसे पर विस्तृत बात हुई है। यह पुस्तक पत्रकारिता के छेत्र में काम करने वाले पत्रकार, रिपोर्टर को ज़रूर पढ़ना चाहिए। यह पीएचडी के शोधरतियों को पढ़ना चाहिए ताकि वह पत्रकारिता के बदलते स्वरूप को समझ के आपना शोध अच्छे से लिख सके। 2015 में पत्रकारिता की दिशा को समझने के यह पुस्तक ठीक है। पुस्तक 128 पृष्ठों की अनन्य प्रकाशन से 2015 में छपी है। इसकी कीमत केवल 95 रुपये की है।

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