टेलिविजन की भाषा पर प्रकाश डालती पुस्तक
'टेलीविज़न की भाषा' यह पुस्तक हरिश चंद्र बर्णवाल ने लिखी है। हरिश चंद्र बर्णवाल का जन्म पश्चिम बंगाल के आसनसोल में हुआ, शिक्षा दिल्ली विश्वविद्यालय और जामिया मिल्लिया इस्लामिया से की है। वह IBN7 समाचार न्यूज़ चैनल में एसोसिएट एक्सक्यूटिव प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरथ थे। उन्होंने अपने टेलीविज़न में हुए अनुभव के आधार पर यह पुस्तक लिखी है। इसमें टेलीविज़न की भाषा पर जोर दिया है। पहले अध्याय में ही वह दृश्य और श्रव्य को एक समान महत्व दिया है। वह कहते है कि ' भाषा टेलीविज़न में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। अध्याय 2 से 5 तक में भाषा के उपयोग पर जोर दिया गया है। एक अध्याय में उन्होंने एंकर की भाषा और उसकी भूमिका को विस्तार से बताया है। पृष्ठ 71 पर हिंदी और अंग्रेजी में ताल मेल बैठाने पर चर्चा किया गया है आगे के कुछ पृष्ठों में। टेलीविजन और भाषा के संबंद्ध को पृष्ठ 182 से ही बताना शुरू किया है। भाषा का सही तरीके से और सही रूप में इस्तमाल करना है। अगर शब्द थोड़ा सा भी इधर से उधर हुआ तोह अर्थ का अनर्थ हो जाएगा। पृष्ठ 184 से 205 तक समाचार में मोहवारे और लोकोवितयो का इस्तेमाल कैसे किया जाए ? यह बताया है । हिंदी के साथ सौतेला व्यवहार क्यों ? इस अध्याय में वह हिंदी भाषा के उपयोग का को विस्तार देने की बात कर रहे है एवं अपने प्रश्न का उत्तर भी स्वयं देते है। यह पूरी पुस्तक टेलीविज़न में भाषा का महत्व व स्थान पर केंद्रीत है। हर प्रकार की जानकारी भाषा से जुड़ी मिलेगी । यह पुस्तक की प्रशंसा उनके मित्र राजदीप सरदेसाई जो अनेक चैनेल में कार्यरथ रहे ने भी की है। यह पुस्तक 235 पृष्ठों की , जिसका मूल्य 350 रुपये है। यह पुस्तक के दो संस्करण छापे राधाकृष्ण पिब्लिकेशन नई दिल्ली ।

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